काव्य कणिका


छोडो ये किताबोसे सीखना

कुछ हम तुमसे सीखे

कुछ तुम हमसे सीखो….

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ऐसे आदमीओ से तो बहुत डरते है हम.

एक तो जूठ बोलते है

फिर कहते है आपकी कसम……

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दर्द की तो हमें आदत पड गई,

बेदर्दो के साथ वास्ता है जो…..

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बेदर्दो से दर्द नहीं मिटता,

दर्द मिटा ने केलीये हमदर्द चाहिए.

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केसी गजब दुनिया है ये Word छुपाने केलिए Password चाहिए….

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जिसकी राह पे हम चलने निकले, क्या करू इन्होने ही राह बदलली…..

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हर घडी वो घडी नहीं रहेती, जिसका घडी घडी इंतजार करते थे,

पल तो आकर चला जाता है, जिसका पल पल इंतजार करते है.

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वख्त को इल्जाम मत दो, उसका तो काम ही है चलाना,

एक हम ही है की वख्त के साथ चल न पाए, इल्जाम वख्त को देते है….

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मे हिन्दू, मे मुस्लिम करते है एक-दुसरे पे वार,

समजते क्यों नहीं यार, हम है एक परिवार.

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मुस्कराहट मुस्कराहट में फर्क है……

किसी के साथ भी मुस्कुराया जाता है,

और किसी पर भी मुस्कुराया जाता है.

मुस्कराने  से रिस्ते जोड़े भी जाते है,

मुस्कराने  से रिस्ते तोड़े भी जाते है.

  • नितिन गज्जर
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भक्तो…, अब भुक्तो…..


महेंगाई की मार…,
व्यापम भ्रष्टाचार…,
कोमी दंगो की भरमार…,
युवाओं बेकार…,
फीका है, त्यौहार…,
महिलाओ पर अत्याचार…,
रामदेव का व्यापार…,
मिडिया का समाचार…,
दंगाई हुए जेल से बहार…,
रु.१०० की मिले सब्जी चार…,
FDI के लिए खुला द्वार…,
देशवासीकी टोपी की नहीं की दरकार…,
ले लिया पाकिस्तानी सारी का उपहार…,
देश की सीमा निराधार…,
पडोशियो से लाचार…,
चाइना के लिए खुला द्वार…,
कहा गया चोकिद्वार…,
ले आये फेकू अवतार…,
– नितीन गज्जर

आतंकवादियो से ज्यादा तो आप से लोग मरते है.


नोकरियात के पास काम लेके जाना पडता है, बिना पैसो के वापस आना पडता है,

मैंने कहा : आपको तो पगार मिलती है, इसी से गृहस्ती नहीं चलती है?

उसने कहा : पैसा इसलिए लेना पडता है, हम भी आगे देना पडता है.

मैंने कहा : पगारदार तो और भी है, उसकी तो गृहस्ती चलती है,

उसने कहा : वही तो तुम्हारी गलती है, बिना रिश्वत के चूल्हे की आग नहीं जलती है.

मैंने कहा : मैं नहीं रिश्वत देने वाला, चाहे अपने आप को क्यों न जलाना पड़े.

उसने कहा : कई लोगो ने वो भी किया है, लेकिन मुझे लगता है, ऐ सही नहीं किया है.

मैंने कहा : आग तो अपने आप को लगाऊंगा, लेकिन तुजे तो मै फसाउंगा.

उसने कहा : थोड़े दिन मीडियावालो से आग लग जाएगी, फिर हर वख्त की तरह बुज जाएँगी

मैंने कहा : ऐसी आग लगाऊंगा, तुजे भी साथ मे जलाऊंगा.

उसने कहा : ऊसीसे तेरा काम नहीं हो पाऐगा, मुफ्त मे मारा जाएगा.

मैंने कहा :

अपनेआप को नहीं तुजे ही जलाएंगे,

फिर लगता है,

दूसरे दिन तेरी जगह कोई और नजर आयेंगे.

हम ऐसा नहीं कर पाऐगे, क्यों की हम इश्वर से डरते है.

किसीने सच ही कहा है, जो उपरवाले से ना डरे इसीसे डरो.

अब पता चला, आप से लोग क्यों डरते है..!

आतंकवादियो से ज्यादा तो आप से लोग मरते है.

( ऐ हे आज का दर्पण, ऐ कविता राजकोट के विश्वकर्मा परिवार को अर्पण

जिसके परिवार के ५ लोगोने एक साथ एप्रिल-२०१३ को आत्महत्या की थी.)

-नितिन गज्जर

दुनिया ऐसे ही चलती है


दुनिया ऐसे ही चलती है, उसमे मेरी क्या गलती है.

महेंगाई रोज बढती है, उसमे मेरी क्या गलती है.

जब बजेट आता है, तो पब्लिक मार खाता है,

केंद्र एक्साइज बढाता है, तो राज्य वेट बढाता है.

कोई कमीशन खाता है, कोई बिना कमीशन को सताता है,

जो कार्यालय का एजंट बताता है, पब्लिक को वही सताता है.

कोई साधू के बेशमे आता है, आश्रम से धंधा चलाता है.

कोई भविष्य बताता है, पब्लिक को ऐसे ही फसाता है.

काम करवाने के जो पैसा लेता है, ऐसे हमारे नेता है.

भोली पब्लिक ऐ सबसे फिसलती है, पब्लिक की वही तो गलती है.

दुनिया ऐसो से ही चलती है, उसमे मेरी क्या गलती है.

 

-नितिन गज्जर